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مَنْ يَسرِقُ جِدرانَ الحارَةْ
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و يَغيظُ الفَجرَ و أنوارَهْ
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مَنْ يَسرِقُ إسْمَ مَدِينَتِنا
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و يُخيفُ الخوفَ و أخطارَهْ
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مَنْ يَسرِقُ جدرانَ الحارَةْ ؟ |
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حاصرتُ الخوفَ بأورِدَتي
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و مشطتُ الليلَ و أقمارَهْ
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و نبشتُ الكونَ و غفوتَهُ
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أرضاً و سماءً و مَغَارَةْ
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فإذا باللصِّ و حضرَتِهِ
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فأرٌ يتربَّعُ أقذارَهْ |
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يمتصُّ زماناً سِحريّاً
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يمتصُ العُمْرَ و اعمارَهْ
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و يلوكُ بقايا أطلالٍ
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سُلِبَت مِن مَجدٍ و حضارَةْ |
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أدبَرتُ و هازمُ أخيِلَتي
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فارٌ ذو عينٍ جبَّارَةْ
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فأرٌ يَهْزِمُني ! يا خَجَلي
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خجلاً معجوناً بحقارَةْ |
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يَسلِبُني فرحةَ أعيادي
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وكؤوسَ الأُنسِ و أوتارَهْ
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يَسْلِبُني ليلاً شاميَّـاً
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أهديتُ ( لِنَجدٍ ) أزهارَهْ
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أدبَرتُ و هازمُ أخيِلَتي
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فأرٌ ذو عينٍ جبَّارَةْ
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يَلْهو و الدُّنيا تراقصهُ
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و الكأسُ تُراقِصُ دينارَهْ
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و يُقَبِّلُ فأرتَهُ شوقاً
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برطوبةِ صَيفٍ و حَرَارَةْ
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و يُقَدِّمُ جِدرانَ الحارَةْ
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مائِدةً تُغري سُمَّارَهْ
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