| صافحيني مرّةًً ، لا بفتور وارتخاءِ
|
| بل كما يفعل كلّ الأصدقاء
|
| بيدٍٍ تنبض ودّاًً و حنانا
|
| أوهميني أن لي في قلبك النائي مكانا
|
| و دعي أنملكِِ الرخصة تغفي في يدي
|
| لحظاتٍٍ قبل أن تبتعدي
|
| ليظلّ الدفء يسري في دمائي
|
| قبل أن أبقى وحيداًًًً مع أحزان المساءِِِِِِِ
|
| آه، لوأنا تلاقت كالمحبين يدانا
|
| لتحديتُ الزمانا
|
و لكانت أنجم الليل وسادي|
| |
| آه يا سمراءُُ،يا أجملَ أزهار بلادي
|
| صافحيني بحنان عندما نفترقُ
|
أنا في عينيكِِ أفنى..إنني أحترقُ | |