| حسناء .. شط بي الخيال .. |
وكدتُ ألهو عنك حينا
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| سأصب في سمع الزمان |
"حكايتي" .. شعراً مبينا
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| لحناً .. تعلّين العذوبة .. |
من يديه .. وتنهلينا
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| أنا في الشآم .. وما أرقّ |
الشام.. أهبطها سجينا |
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| هذا الشتاء .. أحسه |
فيها ربيعَ الحالمينا
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| "ألغوطة" الخضراء .. |
لم تك قبلُ مُترعَةً فتونا
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| والعطر .. لم يك مُسكِراً |
كاليوم .. للمتنسِّمينا |
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| والشارع المغمور في |
"القصّاع |
| وأطل .. حيث رنوتُ .. |
ضمّ طريقنا حوراً ، وعينا
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| وفتوةً .. وكهولةً |
غادين حولي .. رائحينا
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| حتى الجذوع العاريات |
بدوت تَشُوق الناظرينا
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| حتى الطريق - وهل يحس؟ - |
حسبته .. يهتزّ لينا |
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| وأشحتُ وجهي .. ما الطبيعةُ ؟ |
ما الحياة ؟ .. لخانعينا |
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| يا من تحت على الرصيف |
خطاك .. أو تمشي رصينا |
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| لا فرق .. فيما بيننا |
لو تعلم الخبر اليقينا
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| لا فرق .. صدّقني .. فإنّا |
في "النظارة" أجمعينا |
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| ما دام في أرض العروبة |
حربةٌ .. "للغاضبينا"
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| لا فرق .. معتقلين كنا |
يا أخي .. أو مُطْلقينا |
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| تتراكم الأغلال حتى |
تشملُ الشعبَ الأمينا
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عنوان القصيدة: في الشام
بقلم سليمان عيسى
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