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حين يصحو قمري ،تصحو عيوني
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يا لهُ من قمر ٍ منه فنوني
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عابرٌ في هذه الدنيا سبيلاً
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لستُ أدري ما الذي أشقى سنيني
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لا تلوموني أحبّائي فإنّي
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شاعرُ غنّيتُ من نار الحنين ِ
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لا تُدينوني غريباً أو بعيداً
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فجنوني ناضجُ عبر القرون ِ
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عفوكم إن كنتُ غيّرتُ طريقاً
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ديدَني حرّيّةٌ بلّت جفوني
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شعبُنا يكظم غيظاً من لئيم ٍ
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شعبنا يرقى لإحياءِ البنين ِ
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حين يصحو قمري ترقى بلادي
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فبلادي الحبُّ في قلب ٍ متين ِ
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